जीवन यज्ञ - परिचय श्रीमद् भगवद्गीता अध्याय चौथा से
सब कुछ ब्रह्म जानकर काम करो
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भगवद गीता का चौथा अध्याय बहुत ही खास है क्योंकि यहाँ पहली बार श्रीकृष्ण ने अपनी दिव्यता और अवतार होना दर्शाया है और बताया है कि उनका जन्म हम सभी से कैसे अलग है।
हम सभी अपने प्रारब्ध कर्म को काटने के लिए माया के प्रभाव में असहाय रूप से जन्म लेते हैं। लेकिन, श्रीकृष्ण के लिए कोई संचित या प्रारब्ध नहीं है, इसलिए माया की दिव्य शक्ति का उपयोग करके उनका दिव्य जन्म होता है।
चौथे अध्याय के श्लोक 7-8 में श्रीकृष्ण बताते हैं कि जब भी धर्म और कर्त्तव्य में गिरावट आती है, तब नीतिपरायण और सदाचारी लोगों की रक्षा करने, दुष्टों को दंडित करने, और धर्म की पुन: स्थापना करने के हेतु वह जन्म लेते है।
आगे जाकर, श्रीकृष्ण चातुर्वर्ण और उनमें जुड़ी प्रत्येक वर्ण भूमिकाओं की व्याख्या करते हैं। श्लोक 18-24 में श्रीकृष्ण बताते हैं कि कैसे एक प्रबुद्ध व्यक्ति कर्म में अकर्म और अकर्म में कर्म को देखता है और कैसे कोई यज्ञ की भावना के साथ अपने कर्तव्यों का पालन करके 24वें श्लोक में बताए अनुसार हर चीज में ब्रह्म को देखने की प्रबुद्ध स्थिति तक पहुंच सकता है।
इस अध्याय के श्लोक 25-30 में श्रीकृष्ण 12 साधनाओं की सूची प्रदान करते हैं। यदि हम उन साधनाओं को यज्ञ की भावना से कर सकें, तो यह हमें अपने मन को शुद्ध करके उसे 24 वें श्लोक में दी गई आत्मज्ञान की स्थिति के योग्य बना सकते है।
31 से 42 तक के शेष श्लोक हमारे कर्तव्यों और नियमित साधनाओं को करने पर जोर देते हैं, यदि आवश्यक हो, तो हमें आध्यात्मिक पथ पर दृढ़ रहने के लिए गुरु से सहायता लेने की सलाह भी देते हैं।