Publisher Description

कृष्णकांत का विल (वसीयतनामा) बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय का एक सामाजिक-पारिवारिक उपन्यास है। उपन्यास में स्त्री स्वभाव की रस्सा-कस्सी समानंतर चलती रहती है। उपन्यास का आधार बंगाली परिवार-परिवेश है। बंगाली समाज में वसीयत का बड़ा महत्व रहा है। श्रम की दुर्बलता से पैतृक साधनों पर निर्भरता ज्यादा बढ़ती है। और जहाँ समाज का स्वरूप ज्यादा सामन्ती हो वहाँ श्रमशीलता का ठहराव स्वभाविक हो जाता है। बंगाली समाज में सामंती स्वभाव के लक्षण कुछ ज्यादा ही मौजूद रहे हैं। एक तो पहले से ही भारतीय समाज का ढांचा सामंतवादी रहा है और दूसरा अंग्रेजों के आने के बाद पहला भूमि बंदोबस्त बंगाल प्रान्त में किया गया, स्थाई बंदोबस्त के नाम से। इस तरह बंगाली समाज में वसीयत का महत्व अनुपातन ज्यादा रहा है दूसरे समाजों की अपेक्षा। कृष्णकांत का विल उपन्यास का कथानक वसीयत के बटवारे, उसकी खींच-तान, ऊँच-नीच, उठा-पटक से आरम्भ होता है, लेकिन आगे चलकर कथा स्त्रिओं के स्वभाव, गुण-अवगुण तथा चरित्र के पड़ताल में लग जाती है। चूँकि बंगाली समाज में सामंती स्वभाव ज्यादा प्रबल रहे हैं अत: स्त्री की दासता स्वभाविक रूप से स्वीकार्य रही है। पुरुष वहाँ स्वामी है, सर्वगुण सम्पन्न और श्रेष्ठ है। स्त्री भक्त है, दासी है किसी अनुचित कार्य के विरोध का अधिकार उसके पास नहीं है। लेकिन ऐसे ही कठोर दबाव की स्थिति में कोई व्यक्ति अथवा जाति विरोध का स्वर मुखर करती है और निर्णय लेने की स्थिति में आती है। ऐसे ही ताने-बाने से बंकिम बाबू ने इस उपन्यास को तैयार किया है जो कि एक रोचक और पठनीय पुस्तक है।

GENRE
Fiction & Literature
RELEASED
2016
December 13
LANGUAGE
HI
Hindi
LENGTH
147
Pages
PUBLISHER
Public Domain
SELLER
Public Domain
SIZE
1
MB

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